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साधु ने पूछा क्या आपका पति घर पर है

साधु ने पूछा क्या आपका पति घर पर है




एक व्यक्ति ने एक साधु से कहा मेरी पत्नी धर्म साधना में शरदा नहीं रखती अगर आप उसे थोड़ा समझा दें तो बड़ा अच्छा होगा साधु बोले ठीक है अगले दिन प्रातः काल ही साधु उसके घर गया वह व्यक्ति घर पर नहीं दिखा दो साधु ने उसके संबंध में उस पत्नी से पूछा पत्नी ने कहा जहां तक मैं समझती हूं वह इस समय बाजार में जूते की दुकान पर झगड़ा कर रहे हो पति पूजा घर में माला जप रहा था उसने पत्नी की बात सुनी तो उसे यह झूठ शाह नहीं गया वह बाहर आकर बोला यह बिल्कुल गलत है मैं पूजा घर में था साधु हैरान हो गया पत्नी ने यह देखा तो पति से पूछा सच बताओ कि क्या तुम पूजा घर में थे क्या तुम्हारा शरीर पूजा घर में माला हाथ में और मन कहीं और नहीं था पति को होश आया पत्नी ठीक कह रही माला फेरते फेरते वे सचमुच जूते की दुकान पर पहुंच गया था उसे जूते खरीदने थे और रात को ही उसने पत्नी से कहा था कि सवेरा होते ही जूते खरीदने जाऊंगा माला कहते फिरते वास्तु में उसका मन जूते की दुकान पर चला गया था और दुकानदार से जूते की मोलतोल पर कुछ झगड़ा भी हो राधा साधु बोले तुम तो कह रहे थे कि मेरी पत्नी धर्म साधना में शरदा नहीं रखती आप उसे थोड़ा समझा दें वह तो तुमसे भी बड़ी साधक और ज्ञानी है विचार को छोड़ो और निर्विचार हो जाओ तो तुम जहां हो वहीं पर वो वहीं परम पिता परमेश्वर आ जाते हैं आइए आपको एक निष्काम भक्ति के शब्द की घटना सुनाता हूं एक बार की बात है एक नाई किसी के बाल बना रहा था उसी समय फकीर जुनैद वहां पहुंचे उन्होंने कहा खुदा की खातिर मेरी हजामत देख कर दो खुदा का नाम सुनते ही अपने ग्राहक कहा खुदा की खातिर उस फकीर की खिदमत मुझे पहले करनी चाहिए खुदा का काम सबसे पहले ही इसके बाद उसने बड़े प्रेम और श्रद्धा भक्ति के साथ फकीर की हजामत बनाई और नमस्कार कर उसे विदा कर दिया कुछ दिन बीत गई एक रोज जुनैद को किसी ने कुछ पैसे पेंट क किए थे वह उन्हें नई को देने आए थे और मैंने पैसे लेने से इंकार कर दिया उसने कहा आपने तो खुदा की खातिर हजामत बनाने का खाता पैसे की खातिर नहीं फिर तो जीवन भर फकीर जुनैद को वह बहुत स्मरण रही और वह कहा करते थे निष्काम ईश्वर भक्ति मैंने हजामत से सीखिए है छोटे से छोटे वक्ती या छोटी सी छोटी बात में भी विराट के संदेश छिपे दोस्तों जीवन में सजग होकर चलने प्रत्येक अनुभव प्रज्ञा बन जाता है जो मूर्छित बने रहते हैं वह दरवाजे पर आए आलोक को भी लौटा देते हैं
ना पढ़ी है मैंने गीता
वेदों का मुझे ज्ञान है

जब से जाना आपको आप ही मेरे भगवान हैं आज परछाई से पूछ लिया क्यों चलती हो मेरे साथ उसने भी हंसकर कह दिया कौन है दूसरा तेरे साथ
 लाजमी तो नहीं जो आंखों से भी देखो
आपकी याद भी आना आपके दीदार से कम नहीं है हृदय में हमेशा आपका वास रे

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